टूटा हुआ दिल

आज मैं जब बस में चढ़ी सारी बस खाली -खाली लग रही थी। ऐसा लग रहा था कि गर्मी के कारण लोगों ने दोपहर में सफ़र करना बंद कर दिया है। खैर! मुझे तो दोपहर में ही सफ़र करना पड़ता है क्योंकि स्कूल की छुट्टी दोपहर के समय ही होती है। बहरहाल आज मुझे खिड़की की सीट आसानी से मिल गई वरना गढ़ मुक्तेश्वर के पास यात्री ढाबे पर बस से कोई उतरता था तब जाकर खिड़की वाली सीट मिलती थी।भरी गर्मी में रोडवेज बस में गर्म लू के थपेड़ो के साथ वो हवा भी सुकून देती थी क्योंकि सप्ताहांत में घर जाने को मिलता था और परिवार से मिलने का जोश भी मन में भरा रहता था। बहुत से लोग उस समय खिड़की बंद कर लेते थे लेकिन मुझे उस हवा के साथ बहना अच्छा लगता था।               मैं अपना सामान व्यवस्थित करके बैठ गई और सोने की तैयारी में ही थी क्योंकि उस दिन मैं थोड़ी थकान महसूस कर रही थी।तभी एक लड़का मेरी सीट से पीछे वाली सीट पर आकर बैठ गया। मैंने उसका चेहरा नहीं देखा था । बस चल पड़ी , दोपहर में सड़कें भी खाली-सी थीं इसलिए बस सही रफ्तार से चल रही थी। लगभग आधा घंटे बाद मेरे पीछे वाली सीट पर बैठा हुआ लड़का किसी से फोन पर बात करने लगा। चूंकि आवाज सामान्य से तेज़ थी इसलिए मेरे कानों में पड़ रही थी। वह किसी लड़की से बात कर रहा था । ये आजकल बहुत आम बात है कि बस आदि में बैठ कर लोग टाइम पास के लिए अपने किसी मित्र या खास मित्र को फोन लगा कर घंटों तक बात करते हैं। लेकिन उस आवाज़ में दर्द था।वह बार -बार यही बोल रहा था कि तुम ऐसा कैसे कर सकती हो, मुझे धोखा कैसे दे सकती हो। ज़ाहिर सी बात है कि फोन के दूसरी तरफ कोई लड़की थी ।वह उसकी प्रेमिका थी यह भी आगे की कुछ बातों से साफ़ हो चुका था।         वह लड़का बहुत परेशान था, बार-बार उसके रोने की आवाज़ भी मुझ तक पहुंच रही थी। जो कुछ मुझे समझ आया उसका सार यह है कि उसकी प्रेमिका की शादी कहीं और हो रही थी और वह उसको विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहा था कि हम दोनों शादी कर लेते हैं जो होगा देखा जायेगा। बातों से यह भी पता चल रहा था कि लड़का अच्छी नौकरी में था।बार -बार उसकी सिसकियां मेरे मन को भी परेशान कर रही थीं ंं। लगभग ढाई घंटा हो चुका था ये फोन वार्तालाप चलते हुए।बीच-बीच में वह हैलो -हैलो बोलता शायद दूसरी तरफ से आवाज़ आनी बंद हो जाती होगी।कितनी बार उसने कहा कि मैं फोन रखता हूं, मैं अब बात नहीं करना चाहता लेकिन एक मौन के बाद फिर बात शुरू हो जाती।                     डासना आ चुका था, अचानक बात -चीत की आवाज़ आनी बंद हो गई अब मेरे कानों में सिर्फ रुदन की आवाज़ आ रही थी। क्या लड़के भी इतने भावुक होते हैं?वह लड़का फूट - फूट कर रो रहा था,बस में अब उसकी आवाज़ लगभग सभी लोग सुन सकते थे, उसके हम उम्र एक -दो युवकों ने उसके पास जाकर उस से पूछने की कोशिश की पर  वह कुछ नहीं बोला और गाजियाबाद में कहीं उतर गया। उसके जाने के बाद मैं यही सोचती रही कि क्यों उस की प्रेमिका ने उसका साथ नहीं दिया? क्यों वह लड़की हिम्मत नहीं कर पायी अपने परिवार से बगावत करने की? अगर हिम्मत नहीं थी तो प्यार नहीं करना चाहिए था । क्यों अधिकतर लड़के ऐसे धोखे खाते हैं जीवन में? प्रेम कहानियां हजारों है , अधिकतर में प्रेमी ही शून्य में चला जाता है ? क्यों प्रेमिका समाज के विरुद्ध अपने प्रेमी का हाथ पकड़ कर नहीं खड़ी रह पाती? क्यों चुन लेती है वह वही जीवन जो उसकी छवि संस्कारी बनाए रखता है उम्र भर? क्यों छोड़ देती है अपने प्रेमी को विरह की आग में जीवन भर झुलसने के लिए?बस यही सोचते हुए मेरा वैशाली मैट्रो स्टेशन आ गया और मैं उतर गई।                                  आज का मेरा सफ़र का साथी ऐसा था जिसका मैंने चेहरा भी नहीं देखा और न ही उससे बात की लेकिन सम्भवतः मैं उसका दर्द महसूस कर पायी।आपको कैसा लगा यह वृत्तांत कमेंट बॉक्स में बताइयेगा।

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